Saturday, 07 December 2019, 7:27 AM

जीवन मंत्र

सतोगुण और तमोगुण का फर्क 

Updated on 28 September, 2019, 6:15
सतोगुण में ज्ञान के विकास से मनुष्य यह जान सकता है कि कौन क्या है, लेकिन तमोगुण तो इसके सर्वधा विपरीत होता है. जो भी तमोगुण के फेर में पड़ता है, वह पागल हो जाता है और पागल पुरुष यह नहीं समझ पाता कि कौन क्या है! वह प्रगति करने... Read More

 प्रयत्न में ऊब नहीं 

Updated on 27 September, 2019, 6:00
संसार में गति के जो नियम हैं, परमात्मा में गति के ठीक उनसे उलटे नियम काम आते हैं और यहीं बड़ी मुश्किल हो जाती है। संसार में ऊबना बाद में आता है, प्रयत्न में ऊब नहीं आती। इसलिए संसार में लोग गति करते चले जाते हैं। पर परमात्मा में प्रयत्न... Read More

वाणी का शरीर पर प्रभाव  

Updated on 25 September, 2019, 6:00
मानव शरीर में अनेक ग्रंथियां होती हैं,पियूष ग्रंथि मस्तिष्क में होती है, उससे 12 प्रकार के रस निकलते है, जो भावनाओं से विशेष प्रभावित होती हैं। जब व्यक्ति प्रसन्नचित होता है, तो इन ग्रनथियों से विशेष प्रकार के रस बहने लगते है, जिससे शरीर पुष्ट होने लगता है, बुद्धि विकसित... Read More

 मौन का तन मन की सुन्दरता के लिये महत्व 

Updated on 24 September, 2019, 6:15
प्रत्येक मनुष्य सुन्दर एवं स्वस्थ्य रहना चाहता है। सुन्दरता एवं स्वस्थ्य का राज मौन मै छिपा हुआ है। सामान्यतŠ चुप रहना मौन है, प्राचीन पुराण बचन के साथ ईष्या, डाह, छल, कपट और हिन्सा को कम करना मोन होता है। मनोवैज्ञानिक ‘फ्रायड’ का कहना है कि जीवन अन्तर्द्वद्वी शृंखलाओं से... Read More

 ध्वनि का प्राणी शरीर पर प्रभाव  

Updated on 23 September, 2019, 6:00
यह जानकर खुश होगें की ध्वनि का प्रभाव प्रत्येक जीव के शरीर पर पड़ता है। वर्तमान औधोगिकी करण और तकनीकि से ध्वनि प्रदूषण अधिक मात्रा में बढ़ रहा है। इस ध्वनि प्रदूषण के परिणाम देखते हुये नोबेल पुरस्कार विजेता डॉ. राबर्ट कॉक ने सन् 1925-26 में एक बात कही थी... Read More

विचार-निर्विचार, चिंतन-अचिंतन 

Updated on 22 September, 2019, 6:00
पूरा विश्व, विचारों पर चलता है, सारे आविष्कार, युध्द, आतंकवाद, साहित्य सृजन, भाषण, प्रवचन, तू-तू, मैं-मैं सब विचारों की देन है। विचार ही सब कार्यों को अंजाम देता है। भक्ति, प्रार्थना, व्यवहार, सेवा सब विचारों की देन है। हम सोचते हैं तो करते हैं होता है। अब प्रश्न यह है... Read More

पाप कर्म का फल हानिकारक है 

Updated on 21 September, 2019, 6:00
कहहिं कबीर यह कलि है खोटी। जो रहे करवा सो निकरै टोटी।। एक छोटा सा पहाड़ी गांव था। ग्राम के सभी लोग शराब व मांस का सेवन करते थे। जो शराब नहीं पीता था, जो मांस नहीं खाता था उसे ग्राम सजा के रूप में ग्राम बाहर कर देते थे।... Read More

सम्मान करो संपूर्णता से 

Updated on 20 September, 2019, 6:00
तुम किसी का सम्मान उसकी ईमानदारी, बुद्धिमत्ता, प्रेम और कार्य कुशलता जैसे सद्गुणों के लिए करते हो परंतु समय के साथ-साथ इन गुणों में परिवर्तन आता है। जिसके कारण तुम उनका सम्मान नहीं कर पाते। तुम केवल सद्गुणों का, महानता का सम्मान करते हो। मैं संपूर्णता से हर एक का... Read More

आत्मा का दिव्य भाव 

Updated on 18 September, 2019, 6:00
जो व्यक्ति दिव्य पद पर स्थित है, वह न किसी से ईष्या करता है और न किसी वस्तु के लिए लालायित रहता है। जब कोई जीव इस संसार में भौतिक शरीर से युक्त होकर रहता है, तो समझना चाहिए कि वह प्रकृति के तीन गुणों में से छूट जाता है।... Read More

प्रधानता आत्मा को 

Updated on 17 September, 2019, 6:00
मनुष्य सामान्यत: जो बाह्य में देखता, सुनता, समझता है वह यथार्थ ज्ञान नहीं होता। किन्तु भ्रमवश उसी को यथार्थ ज्ञान मान लेता है। अवास्तविक ज्ञान को ही ज्ञान समझकर और उसके अनुसार अपने कार्य करने केकारण मनुष्य अपने मूल उद्देश्य सुख-शान्ति की दिशा में अग्रसर न होकर विपरीत दिशा में... Read More

 कैंची काटती है, सुई जोड़ती है 

Updated on 16 September, 2019, 6:00
कैंची काटती (तोड़ती) है और सुई जोड़ती है। यही कारण है कि तोड़ने वाली कैंची पैर के नीचे पड़ी रहती है और जोड़ने वाली सुई सिर पर स्थान पाती है। इसलिए मनुष्य का यही धर्म है कि इनसान को जोड़े न कि तोड़े। उन्होंने सास-बहू में एका होने का आह्वान... Read More

जहाँ शांति है वही सुख 

Updated on 15 September, 2019, 6:00
यदि हमारे पास दुनिया का पूरा वैभव और सुख-साधन उपलब्ध है परंतु शांति नहीं है तो हम भी आम आदमी की तरह ही हैं। संसार में मनुष्यों द्वारा जितने भी कार्य अथवा उद्यम किए जा रहे हैं सबका एक ही उद्देश्य है 'शांति'। सबसे पहले तो हमें ये जान लेना... Read More

जीवन एक क्रिकेट मैच 

Updated on 14 September, 2019, 6:00
प्रांतिकारी संत तरुणसागरजी ने क्रिकेट की व्याख्या करते हुए कहा कि जीवन एक क्रिकेट है, धरती की विराट पिच पर समय बॉलिंग कर रहा है। शरीर बल्लेबाज है, परमात्मा के इस आयोजन पर अम्पायर धर्मराज हैं। बीमारियाँ फील्डिंग कर रही हैं, विकेटकीपर यमराज हैं, प्राण हमारा विकेट है, जीवन एक... Read More

क्या हैं आध्यात्मिक होने का अर्थ 

Updated on 13 September, 2019, 6:00
यह प्रश्न किसी भी जिज्ञासु के मन में उठ सकता है कि हमें ठीक-ठीक ऐसा क्या करना चाहिए ताकि वह जो परम है, जो परमेश्वर है, वह मेरे जीवन में घटित हो सके? सदगुरु इसका उत्तर देते हैं कि अध्यात्म भीगी बिल्लियों के लिए नहीं है, क्या तुम समझ रहे... Read More

ज्ञेय और ज्ञान का संबंध

Updated on 12 September, 2019, 6:00
दर्शन के क्षेत्र में ज्ञान और ज्ञेय की मीमांसा चिरकाल से होती रही है। आदर्शवादी और विज्ञानवादी दर्शन ज्ञेय की स्वतंत्र सत्ता स्वीकार नहीं करते। वे केवल ज्ञान की ही सत्ता को मान्य करते हैं। अनेकांत का मूल आधार यह है कि ज्ञान की भांति ज्ञेय की भी स्वतंत्र सत्ता... Read More

उत्तम आकिन्चन्य, ममता दुख की खान

Updated on 11 September, 2019, 6:30
बाहर के पत्थर फेंकने से काम नहीं चलेगा, बाहर के बोझ के साथ साथ भीतरी बोझ भी उतारना जरूरी है। जव तक चित्त पर काम, क्रोध, लोभ और मोह के पत्थरों का बोझ है, तब तक चेतना का ऊध्र्वारोहण संभव नहीं है। चेतना के ऊध्र्वारोहण के लिये बाहर और भीतर... Read More

 सन्मार्ग की प्रवृत्ति

Updated on 11 September, 2019, 6:00
उत्तम कार्य की कार्य प्रणाली भी प्राय: उत्तम होती है। दूसरों की सेवा या सहायता करनी है, तो प्राय: मधुर भाषण, नम्रता, दान, उपहार आदि द्वारा उसे संतुष्ट किया जाता है। परन्तु कई बार इसके विपरीत प्रिया-प्रणाली ऐसी कठोर, तीक्ष्ण एवं कटु बनानी पड़ती है कि लोगों को भ्रम हो... Read More

प्रेम और समर्पण

Updated on 9 September, 2019, 6:00
प्रेम जीवन की परम समाधि है. प्रेम ही शिखर है जीवन ऊर्जा का. वही गौरीशंकर है जिसने प्रेम को जाना, उसने सब जान लिया. जो प्रेम से वंचित रह गया, वह सभी कुछ से वंचित रह गया। प्रेम की भाषा को ठीक से समझ लेना जरूरी है। प्रेम के शास्त्र... Read More

शांति के लिए संतुलन जरूरी है.... 

Updated on 8 September, 2019, 6:00
अति हमेशा नुकसान दायक है। यह नियम अच्छी और बुरी दोनों आदतों पर लागू होता है। ऋषि-मुनियों ने अति को वर्जित ही बताया है। बुद्ध ने एक शब्द दिया था मंझम मग्न यानी मध्यम मार्ग। जीवन का यह संतुलन उन्हें एक दिन वह सब दिला गया जिसके लिए उनकी पूरी... Read More

 निर्णय में बदलाव पर नजर

Updated on 7 September, 2019, 6:00
लोगों के व्यवहार व कार्यो से या तो तुम सहमत होते हो या असहमत। परंतु इतना सदैव याद रखो कि सब कुछ परिवर्तनशील है। इसीलिए किसी भी निर्णय पर अड़े मत रहो वरना तुम्हारी धारणाएं चट्टान की तरह ठोस हो जाती हैं और तुम्हें व औरों को दु:खी करती हैं।... Read More

पशुवध निंदनीय-दंडनीय कर्म

Updated on 6 September, 2019, 6:00
सतोगुण में किये गये पुण्यकर्मो का फल शुद्ध होता है, अतएव वे मुनिगण, जो समस्त मोह से मुक्त हैं, सुखी रहते हैं। लेकिन रजोगुण में किये गये कर्म दुख का कारण बनते है। भौतिक सुख के लिए जो भी कार्य किया जाता है, उसका विफल होना निश्चित है। उदाहरणार्थ, यदि... Read More

वाणी हमेशा अच्छी रहे 

Updated on 5 September, 2019, 7:00
हमारी वाणी भी जीवन में अहम भाव रखती है और यह बिगड़ जाये तो जीवन कष्टकारी होने में देर नहीं लगती, इसलिए अपनी वाणी हमेशा अच्छी होनी चाहिये। अगर ऐसा नहीं होता तो हमें विपरीन हालातों का सामना करना पड़ता है। कई बार ग्रह दशा से भी वाणी खराब हो... Read More

एकता में भाषा भी अवरोध

Updated on 4 September, 2019, 6:00
भाषा, जो दूसरों तक अपने विचारों को पहुंचाने का माध्यम है, उसे भी राष्ट्रीय एकता के सामने समस्या बनाकर खड़ा कर दिया जाता है. अपनी भाषा के प्रति आकषर्ण होना अस्वाभाविक नहीं है और मातृभाषा व्यक्ति के बौद्धिक विकास का सशक्त माध्यम बन सकती है, इसमें कोई संदेह नहीं. पर... Read More

 राष्ट्रीय एकता में बाधक तत्व 

Updated on 3 September, 2019, 6:00
आर्थिक और सामाजिक असमानता राष्ट्रीय एकता में बहुत बड़ी बाधा है। उस असमानता का मूल है अहं और स्वार्थ। इसलिए राष्ट्र की भावात्मक एकता के लिए अहं-विसर्जन और स्वार्थ-विसर्जन को मैं बहुत महत्व देता हूं। जातीय असमानता भी राष्ट्रीय एकता का बहुत बड़ा विघ्न है। उसका भी मूल कारण अहं... Read More

मन की शक्ति 

Updated on 2 September, 2019, 6:00
मन को जीवन का केंद्रबिंदु कहना असंभव नहीं है। मनुष्य की प्रियाओं, आचरणों का प्रारंभ मन से ही होता है। मन तरह-तरह के संकल्प, कल्पनाएं करता है। जिस ओर उसका रुझान हो जाता है उसी ओर मनुष्य की सारी गतिविधियां चल पड़ती है। जैसी कल्पना हो उसी के अनुरूप प्रयास-पुरुषार्थ... Read More

कर्त्तव्य को बनाएं सर्वोपरि लक्ष्य 

Updated on 1 September, 2019, 6:00
अध्यापक ने विद्यार्थियों से पूछा- ‘रामायण और महाभारत में क्या अंतर है?’ विद्यार्थियों ने अपनी-अपनी समझ के अनुसार उत्तर दिए। अध्यापक को संतोष नहीं हुआ। एक विद्यार्थी ने अनुरोध किया- ‘आप ही बताइए’ अध्यापक बोला-रामायण और महाभारत में सबसे बड़ा अंतर है ‘हक-हकूक’ का। रामायण में राम ने अपना अधिकार... Read More

साधना और सुविधा 

Updated on 31 August, 2019, 6:00
आसक्ति के पथ पर आगे बढ़ने वाले अपनी आकांक्षाओं को विस्तार देते हैं। उनकी इच्छाओं का इतना विस्तार हो जाता है, जहां से लौटना संभव नहीं है। उस विस्तार में व्यक्ति का अस्तित्व विलीन हो जाता है। फिर वह अपने लिए नहीं जीता। उसके जीवन का आधार पदार्थ बन जाता... Read More

 प्रेम और सहयोग का नाम है परिवार  

Updated on 30 August, 2019, 6:00
पारिवारिक सदस्यों के त्याग, सहयोग, स्वच्छता, प्रेम, संतुष्टि व व्यसनमुक्ति से ही परिवार संयुक्त और समृद्घिशाली बनता है। वे सौभाग्यशाली हैं जो संयुक्त परिवार में रह रहे हैं तथा जिन्हें माता -पिता का सान्निध्य प्राप्त हो रहा है। विश्व बंधुत्व की बात करने वालों को पहले अपने परिवार में बंधुत्व... Read More

कर्म के पाप-पुण्य में फंस जाता है जीव  

Updated on 29 August, 2019, 7:15
ईश्वर क्षेत्रज्ञ या चेतन है, जैसा कि जीव भी है, लेकिन जीव केवल अपने शरीर के प्रति सचेत रहता है, जबकि भगवान समस्त शरीरों के प्रति सचेत रहते हैं। चूंकि वे प्रत्येक जीव के हृदय में वास करने वाले हैं, अतएव वे जीवविशेष की मानसिक गतिशीलता से परिचित रहते हैं।... Read More

सुख की उपेक्षा क्यों?  

Updated on 28 August, 2019, 6:00
मेरे पास लोग आते हैं। जब वे अपने दुख की कथा रोने लगते हैं, तो बड़े प्रसन्न मालूम होते हैं। उनकी आंखों में चमक मालूम होती है। जैसे कोई बड़ा गीत गा रहे हों! अपने घाव खोलते हैं, लेकिन लगता है जैसे कमल के फूल ले आए हैं। सुख की... Read More