राजधानी में एम्स और मेडिकल कॉलेज की लैब में रोजाना 2 हजार कोरोना टेस्ट होने लगे हैं। इस माह के अंत तक इन्हें बढ़ाकर 4 हजार किया जा रहा है। इसके लिए आरटीपीसीआर के अलावा ट्रू नॉट टेस्टिंग और रैपिड एंटीजन टेस्ट बढ़ाए जा रहे हैं। मंदिर हसौद स्थित निजी मेडिकल कॉलेज को भी आरटीपीसीआर मशीन नहीं लगाने पर मान्यता रोकने का अल्टीमेटम दिया गया है, इसलिए वहां भी इसी माह जांच का सेटअप तैयार हो जाएगा। इसके बाद सितंबर से ही शहर में रोज 4 हजार टेस्ट होने लगेंगे।
राज्य में हालांकि अभी रोज औसतन आठ हजार संदिग्धों के सैंपल की जांच की जा रही है, इसमें राजधानी में ही सबसे ज्यादा टेस्ट हो रहे हैं। यहां संक्रमण ज्यादा फैल रहा है, इस वजह से जांच का सिस्टम भी यहीं तेजी से बढ़ाने के प्रयास किए जा रहे हैं। अंबेडकर अस्पताल की लैब में अभी रोज 800 से 900 और एम्स में एक हजार से ज्यादा सैंपलों की जांच आरटीपीसीआर सिस्टम से की जा रही है। लालपुर स्थित लेप्रोसी अस्पताल की लैब में ट्रू नॉट फार्मूले से 300 से 400 सैंपल के टेस्ट किए जा रहे हैं। रैपिड एंटीजन टेस्ट से कालीबाड़ी स्थित जिला अस्पताल की लेबोरटी में जांच हो रही है। हालांकि कोविड कोरोना की जांच में आरटीपीसीआर सिस्टम सबसे ज्यादा भरोसेमंद है, इसलिए इसी फार्मूले को ज्यादा से ज्यादा बढ़ाने के प्रयास किए जा रहे है। मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया ने भी सभी प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों को मशीन लगाने की शर्त पर ही आने वाली बैच के प्रवेश की अनुमित देने का निर्णय लिया है।
आरटीपीसीआर : इसका फुल फार्म रियल टाइम पॉलीमरोज रिएक्शन है। यह जांच का सबसे विश्वसनीय फार्मूला है। इस सिस्टम से जांच की सुविधा अभी एम्स के अलावा राज्य के सभी पांच मेडिकल कॉलेजों में है। इस फार्मूले में किसी भी संदिग्ध का सैंपल लेने के बाद पहले उसे आरटीपीसीआर प्रोसीजर में ट्रीट किया जाता है। इसमें जांचने के बाद सैंपल को आरटीपीसीआर मशीन में डालकर जांच की जाती है। दोनों प्राेसीजर 8-9 घंटे में पूरा होता है।
रैपिड एंटीजन : कोरोना मामलों में इस फार्मूले का उपयोग कंटेनमेंट जोन या जहां बड़ी संख्या में पॉजिटिव होने का शक रहता है, वहां किया जाता है, ताकि जल्द रिपोर्ट मिले। राजधानी में जब बड़ी संख्या में पलायन करने वाले मजदूर पहुंच रहे थे, तब इसी फार्मूले से जांच की जा रही थी। मंगलबाजार और शदाणी दरबार में एक साथ ज्यादा केस मिलने पर वहां भी इसी सिस्टम से संदिग्धों की जांच की गई। हालांकि इस टेस्ट रिपोर्ट की पुष्टि आरटीपीसीआर से करना जरूरी है।

ट्रू नॉट टेस्ट : जांच की ये पद्धति भले ही पूरी तरह से विश्वसनीय नहीं पर बतौर सैंपलिंग जहां रिपोर्ट जल्दी प्राप्त करना होता है, वहां इस फार्मूले का उपयोग किया जा रहा है। इसके ट्रीटमेंट के सिस्टम में एक बार में दो या चार सैंपल की ही जांच की जा सकती है। इसमें एक सैंपल की रिपोर्ट आने में दो से ढाई घंटे लगते हैं। चूंकि इसकी मशीनें छोटी-छोटी हैं, उसमें ज्यादा सैंपल एक बार में ट्रीट नहीं किए जा सकते, इसलिए दो-तीन सौ सैंपल की जांच ही की जा रही है।